September 14, 2026

ईरान ने प्रधानमंत्री मोदी के साथ बातचीत

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नई दिल्ली — ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशक्यान ने 21 मार्च को भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ एक उच्च स्तरीय टेलीफोनिक बातचीत की, जिसमें उन्होंने अमेरिका और इजरायल के साथ चल रहे क्षेत्रीय संघर्ष को समाप्त करने के लिए तेहरान की विशिष्ट शर्तों का विवरण दिया। इस चर्चा का मुख्य केंद्र दीर्घकालिक क्षेत्रीय शांति का रोडमैप, वैश्विक समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा और नई दिल्ली और तेहरान के बीच द्विपक्षीय सहयोग को मजबूत करना था।

शांति के लिए कूटनीतिक रूपरेखा

भारत में ईरानी दूतावास द्वारा जारी आधिकारिक बयानों के अनुसार, राष्ट्रपति पेजेशक्यान ने इस बात पर जोर दिया कि वर्तमान संघर्ष को कम करना बाहरी सैन्य कार्रवाइयों को रोकने पर निर्भर है। ईरानी राष्ट्रपति ने रेखांकित किया कि “क्षेत्र में युद्ध और संघर्ष को समाप्त करने के लिए एक अनिवार्य शर्त अमेरिका और इजरायल द्वारा आक्रामकता को तत्काल रोकना है, साथ ही भविष्य में उनकी पुनरावृत्ति के खिलाफ गारंटी देना है।”

यह संवाद पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच हुआ है, जहाँ सैन्य घर्षण ने अक्सर कूटनीतिक प्रयासों में बाधा डाली है। बातचीत के दौरान, ईरानी पक्ष ने विस्तार से बताया कि दोनों नेताओं ने वैश्विक घटनाक्रमों का विश्लेषण उस परिप्रेक्ष्य में किया जिसे तेहरान ईरानी हितों के खिलाफ अमेरिका और इजरायली प्रशासन द्वारा “निरंतर सैन्य आक्रामकता” के रूप में वर्णित करता है।

समुद्री सुरक्षा और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने क्षेत्र के भीतर महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को निशाना बनाए जाने पर गहरी चिंता व्यक्त की। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर साझा किए गए एक बयान में, प्रधानमंत्री ने उन हमलों की निंदा की जो क्षेत्रीय स्थिरता को खतरे में डालते हैं और अंतरराष्ट्रीय वाणिज्य के प्रवाह को बाधित करते हैं।

मोदी ने कहा, “नौवहन की स्वतंत्रता की रक्षा करने और यह सुनिश्चित करने के महत्व को दोहराया कि शिपिंग लेन खुली और सुरक्षित रहें।” यह टिप्पणी भारत के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत के ऊर्जा आयात का एक बड़ा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। इन जलक्षेत्रों में किसी भी प्रकार की अस्थिरता सीधे भारत की ऊर्जा सुरक्षा और घरेलू अर्थव्यवस्था पर मुद्रास्फीति के दबाव को प्रभावित करती है। प्रधानमंत्री ने क्षेत्र में रहने या काम करने वाले भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और कल्याण सुनिश्चित करने में ईरान के सहयोग के लिए भी आभार व्यक्त किया।

क्षेत्रीय सुरक्षा प्रस्ताव और ब्रिक्स

बातचीत की एक मुख्य विशेषता राष्ट्रपति पेजेशक्यान द्वारा “क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे” का प्रस्ताव था। ईरानी राष्ट्रपति ने विशेष रूप से पश्चिम एशियाई देशों से बने एक सुरक्षा ढांचे की वकालत की, और दावा किया कि “विदेशी हस्तक्षेप” के बिना शांति अधिक प्रभावी ढंग से बनाए रखी जा सकती है।

तेहरान ब्रिक्स (BRICS) ब्लॉक की ओर भी देख रहा है, जहाँ भारत वर्तमान में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। पेजेशक्यान ने आशा व्यक्त की कि यह संगठन शत्रुता को समाप्त करने और अस्थिर क्षेत्र में स्थिरता बहाल करने में मदद करने के लिए अपने प्रभाव का उपयोग करेगा। यह पश्चिमी नेतृत्व वाले कूटनीतिक चैनलों के बाहर बहुपक्षीय समर्थन लेने की ईरान की व्यापक रणनीति के अनुरूप है।

परमाणु पारदर्शिता और ऐतिहासिक मुद्दे

ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं के संबंध में लंबे समय से चले आ रहे आरोपों को संबोधित करते हुए, राष्ट्रपति पेजेशक्यान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा किए गए उन दावों को खारिज कर दिया, जिनमें सुझाव दिया गया था कि यह संघर्ष ईरानी परमाणु हथियारों के खिलाफ एक निवारक उपाय है। राष्ट्रपति ने दोहराया कि ईरान के नेतृत्व ने लगातार परमाणु हथियारों के विकास के खिलाफ रुख अपनाया है।

पेजेशक्यान ने तेहरान को क्षेत्रीय अस्थिरता के स्रोत के रूप में चित्रित करने वाले आरोपों को भी खारिज कर दिया। इसके बजाय, उन्होंने लेबनान, गाजा और इराक में इजरायली अभियानों को वर्तमान अस्थिरता का कारण बताया। ऐतिहासिक संदर्भों का हवाला देते हुए, राष्ट्रपति ने ईरान में एक स्कूल पर हुई बमबारी का जिक्र किया, जिसमें 168 स्कूली बच्चों की मौत हो गई थी। उन्होंने ईरान के खिलाफ की गई कार्रवाइयों को “अमानवीय” करार दिया।

कड़े बयानों के बावजूद, ईरानी नेता ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम की पारदर्शिता और निरीक्षण प्रदान करने के लिए वैश्विक नेताओं के साथ जुड़ने की इच्छा व्यक्त की, बशर्ते कि ऐसा जुड़ाव शांतिपूर्ण और सम्मानजनक ढांचे के भीतर बना रहे।

निष्कर्ष और भविष्य की दृष्टि

बातचीत संचार के माध्यम खुले रखने के आपसी हित के साथ संपन्न हुई। चूंकि भारत पश्चिम और पश्चिम एशियाई शक्तियों दोनों के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को संतुलित करना जारी रखता है, एक संभावित मध्यस्थ के रूप में उसकी भूमिका तेजी से उजागर हो रही है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब यह देखने के लिए उत्सुक है कि क्या प्रस्तावित “क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचा” पड़ोसी देशों के बीच अपनी जगह बना पाता है या तेहरान द्वारा रखी गई शर्तें वाशिंगटन और यरूशलेम के साथ किसी कूटनीतिक समाधान का मार्ग प्रशस्त करती हैं।

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